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धान की फसल पर मंडरा रहा कीट-रोगों का खतरा, कृषि विभाग ने जारी की एडवाइजरी; किसान तुरंत करें ये उपाय

धान की फसल पर कीट-रोग का हमला
धान की फसल पर कीट-रोग का हमला

धान की फसल इस समय तेजी से बढ़ रही है और आने वाले दिनों में इसकी अच्छी पैदावार के लिए फसल की नियमित निगरानी बेहद जरूरी है। इसी चरण में तना छेदक, हिस्पा और बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट जैसे कीट एवं रोग फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। समय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो पौधों की बढ़वार प्रभावित होने के साथ उत्पादन में भी कमी आ सकती है। किसानों को सतर्क करने के लिए बिहार कृषि विभाग ने धान की फसल में कीट और रोग प्रबंधन को लेकर एडवाइजरी जारी की है। विभाग ने किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने के साथ जरूरत के अनुसार दवाओं के इस्तेमाल और संतुलित उर्वरक प्रबंधन की सलाह दी है।

तना छेदक से धान को ऐसे बचाएं:

तना छेदक धान की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीटों में शामिल है। यह पौधे के तने के अंदर प्रवेश कर ऊतक को नुकसान पहुंचाता है। इससे पौधों में 'डेड हार्ट' और बालियां निकलने के बाद 'व्हाइट ईयर' जैसी समस्या दिखाई दे सकती है, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है।

कृषि विभाग की सलाह के अनुसार, किसान तना छेदक के नियंत्रण के लिए फेरेटेरा (क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल) 8–10 दाने प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं। दवा का प्रयोग फसल की स्थिति और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार करना चाहिए।

हिस्पा कीट पर रखें नजर:

धान में हिस्पा कीट पत्तियों को नुकसान पहुंचाता है। इसके प्रकोप में पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद धारियां या खुरचने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। इससे पत्तियों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित होती है और पौधों की सामान्य वृद्धि रुक सकती है। इसके नियंत्रण के लिए कृषि विभाग ने इमामेक्टिन बेंजोएट 10 SG की 0.3 ग्राम प्रति लीटर पानी या क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल 20 SC की 0.4 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव की सलाह दी है।

बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट से बचाव के लिए संतुलित खाद जरूरी:

धान की फसल में बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट और लीफ स्ट्रिक जैसे रोग भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनके प्रकोप में पत्तियों पर लक्षण दिखाई देने के बाद वे धीरे-धीरे पीली या सूखी पड़ सकती हैं, जिससे पौधे की उत्पादकता प्रभावित होती है।
कृषि विभाग ने किसानों को विशेष रूप से अत्यधिक नाइट्रोजन उर्वरक के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी है। खेत में फसल की आवश्यकता के अनुसार संतुलित मात्रा में ही उर्वरकों का प्रयोग करें। 

सप्ताह में 1-2 बार खेत की निगरानी करें:

धान की फसल को कीट और रोगों से बचाने के लिए केवल दवा का छिड़काव ही पर्याप्त नहीं है। किसानों को खेत की नियमित निगरानी करनी चाहिए। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सप्ताह में कम से कम एक से दो बार फसल का निरीक्षण करना लाभकारी है। पत्तियों का रंग बदलना, पत्तियों पर धारियां या धब्बे दिखाई देना, पौधों का अचानक सूखना, तने के अंदर कीट का प्रकोप या बालियों का सफेद रह जाना जैसे शुरुआती लक्षण दिखाई दें तो तुरंत पहचान कर उचित प्रबंधन करना चाहिए।

समय पर प्रबंधन से बच सकती है फसल:

धान में कीट या रोग का प्रकोप बढ़ने के बाद नियंत्रण करना मुश्किल और महंगा हो सकता है। इसलिए किसान शुरुआत से ही नियमित खेत निरीक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग, उचित जल प्रबंधन और आवश्यकता पड़ने पर अनुशंसित कीटनाशक या रोगनाशक के प्रयोग पर ध्यान दें। सही समय पर की गई निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन से फसल में होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है और धान की बेहतर उत्पादकता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

FAQs:

1. धान में तना छेदक की पहचान कैसे करें?

तना छेदक के प्रकोप में पौधों में डेड हार्ट या बालियां निकलने के बाद व्हाइट ईयर जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

2. धान में हिस्पा कीट क्या नुकसान करता है?

हिस्पा कीट पत्तियों की ऊपरी सतह को नुकसान पहुंचाता है, जिससे सफेद धारियां और खुरचने जैसे निशान दिखाई दे सकते हैं।

3. बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट से धान को कैसे बचाएं?

अत्यधिक नाइट्रोजन से बचें और फसल की जरूरत के अनुसार संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें।

4. धान की फसल की निगरानी कितनी बार करनी चाहिए?

किसानों को सप्ताह में कम से कम एक से दो बार खेत का निरीक्षण करना चाहिए।

5. कीटनाशक का छिड़काव कब करना चाहिए?

कीट या रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह और उत्पाद के लेबल निर्देशों के अनुसार ही छिड़काव करें।

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