भारत ने दलहन अनुसंधान के क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अरहर (तूर) की 'आशा' किस्म का भारत का पहला पूर्ण टेलोमियर-टू-टेलोमियर (T2T) संदर्भ जीनोम विकसित किया है, जिसे वैश्विक स्तर पर भी आधिकारिक मान्यता मिल चुकी है। यह वैज्ञानिक सफलता केवल एक शोध उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य की खेती के लिए बड़ा आधार साबित होगी। इसके जरिए अधिक पैदावार देने वाली, जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील, रोग-प्रतिरोधी और बेहतर पोषण वाली नई अरहर किस्मों का विकास तेज होगा।
अरहर भारत की प्रमुख दलहनी फसलों में से एक है और देश में प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है। खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में इसकी अहम भूमिका है। ICAR के इस नवीन शोध से देश में दलहन अनुसंधान को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। यह उपलब्धि आईसीएआर-राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR-NIPB), नई दिल्ली द्वारा किए गए वर्षों के अनुसंधान का परिणाम है। वर्ष 2011 में इसी संस्थान ने अरहर की 'आशा' किस्म का दुनिया का पहला ड्राफ्ट जीनोम प्रकाशित किया था, जिसे पूरी तरह भारत में अनुक्रमित (Sequenced) की गई पहली फसल का जीनोम भी माना गया। इसके बाद वर्ष 2017 में इसका उन्नत संस्करण जारी किया गया और अब इसका पूर्ण T2T जीनोम विकसित कर लिया गया है।
वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किए गए इस जीनोम में लगभग 75.27 करोड़ (752.65 मिलियन) बेस पेयर DNA का अनुक्रम शामिल है, जिसे 92 कॉन्टिग्स (Contigs) में संयोजित किया गया है। इसमें अरहर के सभी 11 गुणसूत्र (Chromosomes), 11 सेंट्रोमियर और 22 टेलोमियर का पूर्ण विवरण शामिल है। यह जीनोम NIPB_CcT2T_4 नाम से वैश्विक जैविक डेटाबेस NCBI में पंजीकृत किया गया है और 20 अप्रैल 2026 को सार्वजनिक रूप से जारी किया गया।
इस विस्तृत आनुवंशिक अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने अरहर में 36,557 जीनों की पहचान की, जिनसे 48,008 mRNA (कोडिंग अनुक्रम) प्राप्त हुए। ट्रांसक्रिप्टोम (RNA) विश्लेषण में 99.9 प्रतिशत से अधिक सटीक मिलान दर्ज किया गया, जो इस जीनोम की उच्च गुणवत्ता और विश्वसनीयता को दर्शाता है।
दलहनों में आत्मनिर्भरता मिशन को मिलेगा बड़ा समर्थन:
केंद्र सरकार ने वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक 'दलहनों में आत्मनिर्भरता मिशन' शुरू किया है, जिसका उद्देश्य देश में दलहन उत्पादन बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और किसानों की आय में वृद्धि करना है। इस मिशन के तहत उन्नत बीज, आधुनिक कृषि तकनीकों का विस्तार, दलहन क्षेत्रफल में वृद्धि, सुनिश्चित खरीद व्यवस्था और फसलोपरांत अवसंरचना को मजबूत किया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030-31 तक लगभग 3.5 करोड़ टन दलहन उत्पादन हासिल करना है।
किसानों और कृषि अनुसंधान को मिलेगा दीर्घकालिक लाभ:
विशेषज्ञों के अनुसार, अरहर का पूर्ण T2T संदर्भ जीनोम विकसित होना भारतीय कृषि अनुसंधान के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इससे नई पीढ़ी की बेहतर दलहन किस्मों का विकास तेज होगा, जलवायु चुनौतियों का सामना करने वाली खेती को बढ़ावा मिलेगा और भारत के दलहन क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति होगी।
FAQs:
1. अरहर T2T जीनोम क्या है?
यह अरहर (तूर) की पूरी आनुवंशिक संरचना का टेलोमियर-टू-टेलोमियर (T2T) संदर्भ जीनोम है, जिसे ICAR ने विकसित किया है।
2. अरहर T2T जीनोम क्यों महत्वपूर्ण है?
इससे अधिक उत्पादन देने वाली, रोग-प्रतिरोधी और जलवायु परिवर्तन सहनशील नई अरहर किस्में विकसित करना आसान होगा।
3. अरहर T2T जीनोम किस संस्थान ने तैयार किया?
इसे ICAR-राष्ट्रीय पादप जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR-NIPB), नई दिल्ली ने विकसित किया है।
4. दलहनों में आत्मनिर्भरता मिशन का उद्देश्य क्या है?
इस मिशन का लक्ष्य दलहन उत्पादन बढ़ाना, आयात कम करना और वर्ष 2030-31 तक लगभग 3.5 करोड़ टन उत्पादन हासिल करना है।
5. किसानों को अरहर T2T जीनोम से क्या लाभ होगा?
इससे बेहतर बीज, अधिक उपज, रोग प्रतिरोधी किस्में और जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा मिलेगा, जिससे किसानों की आय बढ़ने की संभावना है।