धान की फसल देश की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में से एक है, लेकिन इसकी खेती के दौरान विभिन्न प्रकार के कीट उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं। फसल की अलग-अलग अवस्थाओं में अलग-अलग कीटों का प्रकोप देखने को मिलता है, जिससे समय पर पहचान और नियंत्रण बेहद जरूरी हो जाता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसान फसल की उम्र के अनुसार कीटों की पहचान कर लें और शुरुआती चरण में प्रबंधन अपनाएं, तो उत्पादन हानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
धान की रोपाई के बाद शुरुआती 15 से 30 दिनों के बीच तना छेदक कीट का प्रकोप अधिक देखा जाता है। यह कीट पौधे के तने के अंदर प्रवेश कर उसे नुकसान पहुंचाता है। इसके प्रभाव से पौधे की बीच वाली पत्ती सूखकर सफेद हो जाती है, जिसे ‘डेड हार्ट’ कहा जाता है। बाद की अवस्था में बालियां सफेद होकर खाली रह जाती हैं।
20 से 50 दिन की फसल में पत्ती लपेटक सक्रिय: फसल की वृद्धि अवस्था में पत्ती लपेटक कीट पत्तियों को मोड़कर उनके अंदर भोजन करता है। इसके कारण पत्तियां नलीनुमा दिखाई देने लगती हैं और उनका हरा भाग नष्ट हो जाता है। अधिक प्रकोप की स्थिति में पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित होती है, जिससे उत्पादन में कमी आ सकती है।
राइस हिस्पा पत्तियों को पहुंचाता है नुकसान: 25 से 60 दिन की अवस्था में राइस हिस्पा कीट का प्रकोप देखा जाता है। यह पत्तियों की ऊपरी सतह को खुरचकर नुकसान पहुंचाता है। इसकी वजह से पत्तियों पर सफेद धारियां या खरोंच जैसे लक्षण दिखाई देते हैं और गंभीर स्थिति में पत्तियां सूखने लगती हैं।
40 से 80 दिन की अवस्था में भूरा फुदका धान की सबसे नुकसानदायक कीटों में से एक माना जाता है। यह पौधों का रस चूसता है, जिससे पौधे पीले पड़ने लगते हैं। अधिक प्रकोप होने पर खेत में ‘हॉपर बर्न’ की स्थिति बन जाती है और पूरा खेत सूखने लगता है।
सफेद पीठ वाला फुदका भी बढ़ा सकता है नुकसान: भूरे फुदके की तरह सफेद पीठ वाला फुदका भी पौधों का रस चूसकर नुकसान पहुंचाता है। इसके कारण पौधों की वृद्धि रुक जाती है और पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। लगातार निगरानी और समय पर नियंत्रण इस कीट से बचाव के लिए जरूरी माना जाता है।
बालियां निकलने पर गंधी बग का हमला: धान में बालियां निकलने के समय गंधी बग का प्रकोप बढ़ जाता है। यह दानों का रस चूसता है, जिससे दाने कमजोर हो जाते हैं और उनकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। इस कीट के कारण धान के दानों में बदबू भी आने लगती है और बाजार मूल्य पर असर पड़ सकता है।
व्हाइट ईयर अवस्था में तना छेदक से सबसे अधिक नुकसान: बालियां निकलने से लेकर दाना भरने की अवस्था तक तना छेदक दोबारा नुकसान पहुंचा सकता है। इस दौरान प्रभावित बालियां सफेद दिखाई देती हैं और उनमें दाने नहीं बनते। इसे ‘व्हाइट ईयर’ अवस्था कहा जाता है, जो सीधे उत्पादन को प्रभावित करती है।
नियमित निगरानी से कम होगा नुकसान: विशेषज्ञों के अनुसार किसानों को नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करना चाहिए। आर्थिक क्षति स्तर (ETL) के आधार पर ही कीटनाशकों का उपयोग करना अधिक लाभकारी रहता है। संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर जल निकासी, फेरोमोन ट्रैप का उपयोग और जैविक एवं रासायनिक उपायों का समन्वित प्रयोग कीट नियंत्रण में प्रभावी साबित हो सकता है।
मुख्य बातें: