भारत में कभी पारंपरिक आजीविका तक सीमित माना जाने वाला बांस अब खेती, प्रसंस्करण, निर्माण और ग्रामीण उद्यमिता का बड़ा आधार बन रहा है। 2017 में नियामकीय बदलाव के बाद बांस क्षेत्र को नई गति मिली, जबकि राष्ट्रीय बांस मिशन और तकनीकी पहलों ने किसानों, कारीगरों और महिलाओं को खेती से लेकर बाजार तक नए अवसरों से जोड़ने में मदद की है। मध्य प्रदेश के किसान से लेकर पूर्वोत्तर और महाराष्ट्र की महिला उद्यमियों तक, बांस अब अतिरिक्त आय, रोजगार और ग्रामीण कारोबार का मजबूत जरिया बनता दिख रहा है।
बांस क्षेत्र को बड़े स्तर पर विकसित करने के लिए केवल कारीगरों की कुशलता पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आधुनिक तकनीक, प्रसंस्करण सुविधाएं, प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री और मजबूत बाजार संपर्क भी जरूरी हैं। राष्ट्रीय बांस मिशन (National Bamboo Mission) इसी पूरी value chain को मजबूत करने पर काम करता है। इसके तहत बांस की खेती, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच को बढ़ावा देने के साथ गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उपलब्ध कराने वाली नर्सरियों को भी सहायता दी जाती है।
बांस की खेती किसानों के लिए भी लंबी अवधि की आय का विकल्प बन सकती है। इसका उदाहरण मध्य प्रदेश के विजय पाटीदार हैं, जिन्होंने वर्ष 2019 में पारंपरिक खेती में लगातार नुकसान के बाद बांस की खेती शुरू की। बांस मिशन के सहयोग से उन्होंने करीब 4,000 बांस के पौधे लगाए। केवल दो वर्षों के भीतर बांस की बल्लियों की बिक्री से उन्होंने लगभग ₹75,000 की कमाई की।
बांस की खासियत यह भी रही कि इसके साथ उन्होंने मिर्च, शिमला मिर्च, अदरक और लहसुन जैसी फसलों की अंतर्फसल भी ली। इससे बांस केवल एक दीर्घकालीन फसल ही नहीं रहा, बल्कि खेत में अतिरिक्त आय और विविध खेती का विकल्प भी बना।
बांस की value chain अब सिर्फ टोकरी, फर्नीचर या सजावटी सामान तक सीमित नहीं है। North East Centre for Technology Application and Reach (NECTAR) ने खाद्य एवं कृषि प्रसंस्करण, निर्माण सामग्री, विनिर्माण मशीनरी, नवीकरणीय ऊर्जा और औद्योगिक उत्पादों सहित कई क्षेत्रों में बांस आधारित तकनीकों को बढ़ावा दिया है। इन पहलों से हर साल करीब 3 करोड़ मानव-दिवस का रोजगार सृजित हुआ है। साथ ही बांस उत्पादों में मूल्यवर्धन का स्तर 10% से बढ़कर 70% तक पहुंचा है।
इंजीनियर्ड बांस से निर्माण क्षेत्र में नई संभावनाएं:
Engineered Bamboo बांस के उपयोग को एक नए स्तर पर ले जा रहा है। इसमें बांस के रेशों, पट्टियों या कणों को विशेष प्रक्रिया से जोड़कर और दबाव देकर मजबूत composite material तैयार किया जाता है। इससे बने फर्नीचर और निर्माण उत्पाद अब architects, designers और interior professionals का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। आपदा राहत और पुनर्वास के क्षेत्र में अब तक 42 लाख वर्ग फुट से अधिक engineered bamboo structures बनाए जा चुके हैं।
बांस उद्योग में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी:
बांस की बढ़ती value chain में महिला स्वयं सहायता समूहों और ग्रामीण महिलाओं की भूमिका भी तेजी से मजबूत हो रही है। वर्ष 2020 तक परियोजना के तहत 32 केंद्र संचालित हो रहे थे और करीब 1,100 लोग इससे जुड़े थे। इनमें लगभग 90% श्रमिक महिलाएं थीं। महिलाओं की मासिक आय करीब ₹5,000 तक पहुंची, जबकि रोजगार के दिन सालाना लगभग 45-60 दिनों से बढ़कर 225 दिनों से अधिक हो गए। आने वाले समय में बांस का बढ़ता उपयोग किसानों, कारीगरों, महिलाओं और ग्रामीण उद्यमियों के लिए नई आर्थिक संभावनाएं पैदा कर सकता है।