फसल अवशेष (पराली) जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण के लिए सरकार ने पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली-एनसीटी में एक बहु-स्तरीय निगरानी व्यवस्था लागू की है। इसके तहत धान की फसल कटाई के बाद पराली जलाने की घटनाओं पर कड़ी नजर रखी जा रही है।
फसल अवशेष जलाने की घटनाओं का आकलन करने के लिए सैटेलाइट डेटा का उपयोग किया जा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने राज्य रिमोट सेंसिंग केंद्रों और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के परामर्श से एक मानक प्रोटोकॉल विकसित किया, जिसे अगस्त 2021 में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) द्वारा जारी किया गया।
सैटेलाइट ओवरपास के दौरान सक्रिय अग्नि (फायर इवेंट्स) की पहचान की जाती है। इसके साथ ही उपयुक्त सैटेलाइट डेटा के माध्यम से जले हुए क्षेत्र का भी आकलन किया जाता है। धान कटाई के मौसम में पराली जलाने की घटनाओं की रिपोर्टिंग इसी मानक प्रोटोकॉल के अनुसार रिमोट सेंसिंग केंद्रों के माध्यम से की जाती है, ताकि संबंधित जिला और क्षेत्रीय अधिकारियों को समय रहते अलर्ट भेजे जा सकें और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।
यह प्रोटोकॉल फसल अवशेष जलाने से जुड़ी आग की घटनाओं की निगरानी के लिए नियमित रूप से उपयोग किया जा रहा है। आईएआरआई अपनी CREAMS प्रयोगशाला के माध्यम से हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के लिए दैनिक अग्नि घटना डेटा प्रकाशित करता है।
सैटेलाइट डेटा के माध्यम से क्षेत्रीय स्तर पर निगरानी सफल रही है। हालांकि, उप-दैनिक स्तर पर सैटेलाइट ओवरपास से पहचान की दक्षता और बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त, पराली जलाने की घटनाओं को और प्रभावी ढंग से रोकने के लिए शाम के समय प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा गश्त भी बढ़ाई गई है।
01 अक्टूबर 2025 से 30 नवंबर 2025 के फसल अवशेष जलाने के मौसम के दौरान निगरानी और कार्रवाई को तेज करने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने CAQM के सहयोग से पंजाब के 18 जिलों और हरियाणा के 13 जिलों में 31 फ्लाइंग स्क्वाड तैनात किए। ये टीमें रोजाना अपडेट, फोटो साक्ष्य और अनुपालन की स्थिति साझा करती हैं। फ्लाइंग स्क्वाड ने राज्य सरकारों, नोडल अधिकारियों और जिला प्रशासन के साथ समन्वय कर अपनी दैनिक रिपोर्ट CAQM को भेजीं।
पंजाब में वर्ष 2025 के दौरान पराली जलाने की रोकथाम और निगरानी के लिए 10,500 क्षेत्र कर्मियों की तैनाती की गई। इसके अतिरिक्त, पराली सुरक्षा बल (PPF) के 1,700 कर्मियों को ब्लॉक स्तर पर नोडल और क्लस्टर अधिकारियों के साथ तैनात किया गया। पराली जलाने की घटनाओं की नियमित समीक्षा पंजाब सरकार के मुख्य सचिव स्तर पर DC और SSP के साथ मासिक बैठकों के माध्यम से की गई। इसी प्रकार, हरियाणा राज्य में भी पराली जलाने की रोकथाम और नियंत्रण के लिए 10,000 नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की गई।
उच्च स्तरीय समीक्षा और समन्वय:
इन उपायों के अलावा, दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार ने नियमित समीक्षा और निगरानी जारी रखी। फसल अवशेष जलाने से जुड़े मुद्दों पर कई उच्च स्तरीय बैठकें आयोजित की गईं। 07 अक्टूबर 2025 को माननीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री और माननीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री की सह-अध्यक्षता में मंत्री स्तरीय अंतर-मंत्रालयी बैठक आयोजित की गई। 08 अगस्त 2025 से 20 जनवरी 2026 के बीच कई समीक्षा बैठकें केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की अध्यक्षता में हुईं, जिनमें दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण नियंत्रण, प्रदूषण न्यूनीकरण उपायों और वायु गुणवत्ता प्रबंधन को सुदृढ़ करने की रणनीतियों पर चर्चा की गई।
पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी कमी: इन संयुक्त प्रयासों के परिणामस्वरूप, पंजाब और हरियाणा में वर्ष 2025 के धान कटाई मौसम के दौरान पराली जलाने की घटनाओं में 2022 की समान अवधि की तुलना में लगभग 90 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
FAQs:
Q1. पराली जलाने से सबसे बड़ा नुकसान क्या होता है?
पराली जलाने से गंभीर वायु प्रदूषण होता है, जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों प्रभावित होते हैं।
Q2. पराली जलाने की पहचान कैसे होती है?
सैटेलाइट निगरानी के जरिए फायर इवेंट्स और जले हुए क्षेत्र की पहचान की जाती है।
Q3. CAQM की भूमिका क्या है?
CAQM वायु गुणवत्ता प्रबंधन और पराली जलाने पर नियंत्रण के लिए नीतियां लागू करता है।
Q4. क्या पराली का कोई वैकल्पिक उपयोग है?
हां, पराली का उपयोग बायो-एनर्जी, पशु चारा और मल्चिंग में किया जा सकता है।
Q5. किसानों को पराली न जलाने पर क्या लाभ है?
मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है।