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MP Kharif Advisory: सोयाबीन-धान की बुवाई से पहले करें ये तैयारी: कृषि विभाग ने किसानों को बताए बेहतर उत्पादन के वैज्ञानिक उपाय

सोयाबीन और धान की बुवाई
सोयाबीन और धान की बुवाई

मध्य प्रदेश में खरीफ सीजन की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन कई जिलों में अब तक सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है। ऐसे में खेतों में पर्याप्त नमी आए बिना सोयाबीन और धान की बुवाई करना किसानों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसे देखते हुए मध्य प्रदेश के कृषक कल्याण एवं कृषि विकास विभाग ने किसानों के लिए वैज्ञानिक सलाह पर आधारित विस्तृत एडवायजरी जारी की है। विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे केवल कैलेंडर देखकर नहीं, बल्कि खेत में पर्याप्त नमी सुनिश्चित होने के बाद ही बुवाई करें, ताकि अंकुरण बेहतर हो और दोबारा बुवाई की नौबत न आए।

पर्याप्त नमी होने पर ही करें खरीफ फसलों की बुवाई:

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार खरीफ फसलों की सफल खेती के लिए खेत में पर्याप्त नमी होना सबसे महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब मिट्टी में लगभग चार इंच (करीब एक बालिश्त) की गहराई तक पर्याप्त नमी पहुंच जाए और खेत में 'बतर' की स्थिति बन जाए, तभी बुवाई करनी चाहिए। कम नमी में बीज बोने से अंकुरण प्रभावित हो सकता है, पौधों की संख्या कम रह जाती है और कई बार किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ने के साथ उत्पादन भी प्रभावित होता है।

कृषि विभाग ने अधिकारियों को किसानों के संपर्क में रहने के दिए निर्देश:

कृषि विभाग के संचालक उमाशंकर भार्गव ने मैदानी अमले को निर्देश दिए हैं कि वे किसानों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखें और स्थानीय मौसम की स्थिति के अनुसार कृषि कार्यों के बारे में जागरूक करें। जिन जिलों में अभी तक पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है, वहां किसानों को जल्दबाजी में बुवाई नहीं करने की सलाह दी गई है।

सिंचाई सुविधा वाले किसान इस समय करें खेत की बेहतर तैयारी:

जिन किसानों के पास सिंचाई की व्यवस्था उपलब्ध है, वे इस अवधि का उपयोग मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। कृषि विभाग ने खेतों में ढैंचा और सनई जैसी हरित खाद वाली फसलों की बुवाई करने की सलाह दी है, जिससे मिट्टी में जैविक कार्बन और पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ सके। इसके अलावा खेत तैयार करते समय मिट्टी परीक्षण और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार सड़ी हुई गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP), म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP), जिंक सल्फेट, जिप्सम का संतुलित उपयोग करने की सलाह दी गई है।

सोयाबीन की बुवाई से पहले जरूर करें बीज परीक्षण:

कृषि विभाग ने सोयाबीन उत्पादक किसानों को सलाह दी है कि बुवाई से पहले बीजों का अंकुरण परीक्षण अवश्य करें। केवल 70 प्रतिशत या उससे अधिक अंकुरण क्षमता वाले बीजों का ही उपयोग करें। साथ ही किसानों को कम पानी में बेहतर प्रदर्शन करने वाली तथा रोग एवं कीट प्रतिरोधी उन्नत किस्मों का चयन करने की सलाह दी गई है। बुवाई से पहले बीजों का फफूंदनाशक एवं जैव उर्वरकों से उपचार करना भी आवश्यक बताया गया है, जिससे शुरुआती अवस्था में फसल सुरक्षित रह सके।

आधुनिक कृषि यंत्रों से बढ़ेगी उत्पादन क्षमता:

कृषि विभाग ने किसानों को वैज्ञानिक खेती के लिए आधुनिक कृषि यंत्रों के उपयोग पर भी जोर दिया है। विशेष रूप से रिज एंड फरो सीड ड्रिल, ब्रॉड बेड एंड फरो (BBF) सीड ड्रिल, हस्तचालित सीड डिब्लर जैसे उपकरणों का उपयोग करने की सलाह दी गई है। इनसे जल निकासी बेहतर रहती है और सूखा या जलभराव जैसी परिस्थितियों में फसल को होने वाले नुकसान की संभावना कम हो जाती है।

वर्षा जल संचयन पर दें विशेष ध्यान:

कृषि विभाग ने किसानों से वर्षा जल संरक्षण को खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की अपील की है। खेत तालाब, पोखर, सोख्ता गड्ढों और कुओं में वर्षा जल का संग्रह भविष्य की सिंचाई आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक होगा। वहीं जलभराव वाले क्षेत्रों में कुओं और नलकूपों का रिचार्ज करने से भूजल स्तर बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।

FAQs:

Q1. MP Kharif Advisory में किसानों को क्या सलाह दी गई है?
Ans: किसानों को पर्याप्त नमी होने के बाद ही सोयाबीन और धान की बुवाई करने की सलाह दी गई है।

Q2. सोयाबीन की बुवाई से पहले बीज परीक्षण क्यों जरूरी है?
Ans: 70% या उससे अधिक अंकुरण क्षमता वाले बीजों का चयन करने से बेहतर अंकुरण और अच्छी फसल मिलती है।

Q3. कम बारिश होने पर किसानों को क्या करना चाहिए?
Ans: जल्दबाजी में बुवाई नहीं करनी चाहिए और खेत में पर्याप्त नमी बनने का इंतजार करना चाहिए।

Q4. कृषि विभाग ने कौन-से आधुनिक कृषि यंत्र अपनाने की सलाह दी है?
Ans: रिज एंड फरो सीड ड्रिल, BBF सीड ड्रिल और हस्तचालित सीड डिब्लर का उपयोग करने की सलाह दी गई है।

Q5. वर्षा जल संचयन किसानों के लिए कैसे लाभदायक है?
Ans: खेत तालाब, कुओं और सोख्ता गड्ढों में वर्षा जल संग्रह करने से भविष्य की सिंचाई जरूरतें पूरी होती हैं और भूजल स्तर बनाए रखने में मदद मिलती है.

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