मध्यप्रदेश ने कृषि क्षेत्र में तकनीकी नवाचारों को अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। डिजिटल फसल सर्वेक्षण (डीसीएस) के प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार ने राज्य को 130 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की है। यह राशि प्रदेश में आधुनिक तकनीक आधारित कृषि प्रबंधन को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने बताया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार वर्ष 2025-26 को “कृषक कल्याण वर्ष” के रूप में मना रही है। इस पहल के तहत किसानों की आय बढ़ाने, आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा देने और कृषि प्रबंधन को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। डिजिटल फसल सर्वेक्षण इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है।
राजस्व मंत्री ने कहा कि पारंपरिक गिरदावरी प्रणाली को आधुनिक और त्रुटिरहित बनाने के लिए राज्य सरकार ने जियो-फेंसिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई/एमएल) और सैटेलाइट डेटा जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग शुरू किया है।
डिजिटल फसल सर्वेक्षण में जियो-फेंसिंग तकनीक के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया है कि सर्वेक्षण करने वाला कर्मचारी खेत पर मौजूद रहे। इससे बिना वास्तविक स्थल निरीक्षण के डेटा दर्ज करने की संभावना समाप्त हो जाती है और सर्वेक्षण की विश्वसनीयता बढ़ती है।
जमीनी स्तर पर एकत्रित किए गए सर्वे डेटा का मिलान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सैटेलाइट इमेजरी के माध्यम से किया जा रहा है। इससे सर्वेक्षण की सटीकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और मानवीय त्रुटियों की संभावना काफी कम हो गई है। इसके साथ ही किसानों को सर्वेक्षण और विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी समय पर उपलब्ध कराने के लिए एसएमएस और एआई आधारित वॉइस कॉल की सुविधा भी शुरू की गई है। इससे किसानों को उनकी अपनी भाषा में सीधे मोबाइल पर जरूरी जानकारी मिल रही है।
डिजिटल क्रॉप सर्वे के तहत सर्वेक्षण के दौरान खेत पर मौजूद रहकर फसल की फोटो लेकर जानकारी दर्ज की जाती है। इसके बाद एआई एल्गोरिदम के माध्यम से डेटा का क्रॉस-वेरिफिकेशन किया जाता है, जिससे जानकारी की शुद्धता सुनिश्चित हो सके। सर्वे डेटा का त्रिस्तरीय सत्यापन भी किया जाता है। इसमें पटवारी स्तर पर जांच के साथ-साथ विभिन्न विभागों द्वारा डेटा का उपयोग और परीक्षण शामिल है। जियो-फेंसिंग तकनीक के कारण सर्वे केवल वास्तविक खेत के स्थान पर पहुंचने के बाद ही शुरू किया जा सकता है।
डिजिटल प्रणाली को इस तरह विकसित किया गया है कि इंटरनेट उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में भी सर्वे के दौरान ली गई तस्वीरों की प्रामाणिकता और लोकेशन की सही जानकारी सुरक्षित रहती है। इसके अलावा सर्वे प्रक्रिया को निर्धारित समय सीमा से भी जोड़ा गया है। यदि मोबाइल के समय में किसी प्रकार की छेड़छाड़ की जाती है तो प्रणाली स्वतः सर्वे को रोक देती है।
डेटा आधारित निर्णय लेने में मिलेगी मदद:
डिजिटल फसल सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़े फसल क्षेत्र, उत्पादन अनुमान और विभिन्न कृषि योजनाओं के क्रियान्वयन में डेटा आधारित निर्णय लेने में भी सहायक साबित हो रहे हैं। राज्य सरकार का मानना है कि डिजिटल तकनीकों के प्रभावी उपयोग से मध्यप्रदेश में कृषि प्रबंधन अधिक मजबूत, पारदर्शी और किसान हितैषी बन रहा है। उन्नत तकनीक, विश्वसनीय डेटा प्रबंधन और केंद्र-राज्य के बेहतर समन्वय से यह पहल किसानों के लिए एक मजबूत डिजिटल आधार तैयार कर रही है, जिससे भविष्य में कृषि योजनाओं का लाभ अधिक प्रभावी ढंग से किसानों तक पहुंचाया जा सकेगा।
FAQs:
1. डिजिटल फसल सर्वेक्षण क्या है?
डिजिटल फसल सर्वेक्षण एक तकनीक आधारित प्रणाली है जिसमें खेतों की जानकारी मोबाइल ऐप, जियो-फेंसिंग, AI और सैटेलाइट डेटा की मदद से दर्ज की जाती है।
2. मध्यप्रदेश को 130 करोड़ रुपये क्यों मिले?
केंद्र सरकार ने डिजिटल फसल सर्वेक्षण के सफल और पारदर्शी क्रियान्वयन के लिए मध्यप्रदेश को प्रोत्साहन राशि के रूप में 130 करोड़ रुपये दिए हैं।
3. डिजिटल फसल सर्वेक्षण में कौन-सी तकनीकें इस्तेमाल होती हैं?
इसमें जियो-फेंसिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI/ML), सैटेलाइट इमेजरी और मोबाइल आधारित डेटा कलेक्शन तकनीक का उपयोग किया जाता है।
4. इससे किसानों को क्या फायदा होगा?
किसानों को फसल से जुड़ी सटीक जानकारी, सरकारी योजनाओं का बेहतर लाभ और समय पर अपडेट प्राप्त होंगे।
5. क्या इंटरनेट न होने पर भी सर्वे संभव है?
हाँ, डिजिटल फसल सर्वेक्षण प्रणाली में ऑफलाइन डेटा रिकॉर्डिंग की सुविधा है जिससे इंटरनेट न होने पर भी डेटा सुरक्षित रहता है।